दिल तख्त नशीन बच्चे कौन है?
अपने को सदा दिल तख्तनशीन समझते हो ? यह दिलतख्त सारे कल्प में सिवाए इस संगम युग के कहाँ भी प्राप्ति नहीं हो सकता। *दिखतख्त पर कौन बैठ सकता है? जिसकी दिल सदा एक दिलाराम बाप के साथ है। एक बाप दूसरा न कोई ऐसी स्थिति में रहने वालों के लिए स्थान है दिलतख्त* । तो किस स्थान पर रहते हो ? अगर तख्त छोड़ देते हो तो फाँसी के तख्तेपर चले जाते । जनम जन्मान्तर के लिए माया की फाँसी में फंस जाते हो। *यह तो है बाप का दिलतख्त या है माया की फाँसी का तख्ता* । तो कहाँ रहना है? *एक बाप के सिवाए और कोई याद न आये* अपना शरीर भी नहीं। अगर देह याद आई तो देह के साथ देह के सम्बन्ध, पदार्थ, दुनिया सब एक के पीछे आ जायेंगे। जरा संकल्प रूप में भी अगर सूक्ष्म धागा जुरा हुआ होगा तो वह अपनी तरफ खींच लेगा। इसलिए मंसा, वाचा कर्मणा में कोई सूक्ष्म में भी रस्सी न हो । सदा मुक्त रहो तब औरों को भी मुक्त कर सकेंगे। आजकल सारी दुनिया माया के जाल में फँसकल तड़प रही है, उन्हें इस जाल से मुक्त करने के लिए पहले स्वयं को मुक्त होना पड़े। जितना निर्बन्धन होंगे उतना अपनी ऊंची स्टेज पर स्थित हो सकेंगे।
अव्यक्त वानी 09.03.1981
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