गीता का भगवान कौन?

  गीता का भगवान कौन?

  1.  अभी आज का टॉपिक है की गीता का भगवान् कौन? तो ये टॉपिक हम शुरू करते है एक वात है की आज तक दुनिया में जितनी भी खुदिया हुई है (हरप्पा, मोहन जोद्रो में) या दुनिया के किसी भी प्रान्त में वहा ज्यादा से ज्यादा शंकर का सारभौम यादगार, लिंग मूर्ति मिली है| तो बो ही इस सृष्टि का आदिपुरुष है|

  2. शंकर को आदि पुरुष कहा जाता है|

  3. गीता के 11/38 नंबर श्लोक में लिखा है (त्वमादिदेव पुरुषम पुराण त्वमस्य विश्यस्य परमं निधान ) – सब देवो से भी प्रथम देवादिदेव शिव-शंकर पुरातन पुरुष है| सब कुछ जानने बाले है| जगत विज से बृक्ष के जैसे इनसे विश्त्रित हुई है| 

  4.  शास्त्र में दिखाया गया है की विष्णु और ब्रह्मा को| दोनों शंकर के लिंग का आदि और अंत ढूढने गये , बिष्णु उपर की तरफ गया और ब्रह्मा निचे की तरफ पर किसीको उसका आदि या अंत नहीं मिला| जो गीता में लिखा है की मै अदि और अनंत हु| अजन्मा, असोचता और अकर्ता हु| तो कृष्ण को हम ऐसे भगवन नहीं कह सकते क्योकि उसे जन्मते दिखाया है और मरते भी दिखाया की ब्याध ने उसके पैर में तीर मारा और बो मर गया पर जो भगवान होगा बो तो न जन्मेगा और न मरेगा| और अगर जन्मा तो उसकी मृत्यु भी जरुर होगी क्योकि गीता में लिखा है 2/27 नंबर श्लोक में (जातश्य ही ध्रुबम मृत्युर ध्रुबम जन्म मृतस्य च , तस्मात् अपरीहार्येर्थे न त्वम् सोचितु मर्हासी) अर्थ- जो जन्मता है बो जरुर मरेगा और जो मरेगा बो जन्मेगा जरुर| तो ऐसे तो भगवान जन्म मृत्यु के चक्र में आ जायेगा| लेकिन भगवान् तो जन्म मृत्यु के चक्र में नही आता| तो शंकर को दिखाया की उसे न किसीने जन्मते देखा है न मरते| और भगवान् को त्रिकालदर्शी दिखाया तो बो जरुर जन्म मृत्यु के चक्र में नही आता| 

  5. शंकर के मंदिर में जाकर ही भक्त कहते है (त्वमेव माता च पिता त्वमेव) माना- तुम ही मेरी माता हो और तुम ही मेरे पिता हो| जो कृष्ण के मंदिर में जाकर नही कहते|

  6. शंकर को त्रिकालदर्शी दिखाया गया लेकिन कृष्ण को त्रिकालदर्शी नही दिखाया गया|

  7. हिन्दू शास्त्र में जो तिन मुख्य देवते है बो है ब्रह्मा , विष्णु और महेश| इनमे खा जाता है ब्रह्मा देव, विष्णु देव और शंकर महादेव| मतलब इन दोनों से भी शंकर उचा है| 

  8. कृष्ण को दिखाया की उसके ज्यादा से ज्यादा  मंदिर में  उसके बच्चे के रूप में पूजा होती है| पर गीता में लिखा है की ये जो ज्ञान है, राज बिद्या है ये बहत गुह्य ते गुह्य बात है, तो इतनी गुह्य ते गुह्य बात एक बच्चा कैसे समझ पायेगा| ये गीता के 9/2 श्लोक में लिखा हुआ है (राजविद्या राज्गुह्य्म पवित्रं इह उत्तमं) जो बरा होगा बही तो ये बात समझ पायेगा| जो अभी एक चित्र निकला है शंकर और कृष्ण का | जहा शंकर को दिखाया की उसने कृष्ण को गोद में लिया हुआ है| तो बो कौन है जो ये बात समझ सकता है बो है शंकर|

  9. अब और एक बात कृष्ण को गुरु दिखाया गया है जिसका नाम है संदीपन | माता-पिता-भाई-बहन-सखा-सखिया सब दिखाया | लेकिन गीता के 18/73 नंबर श्लोक में लिखा है की नस्तोमोहा स्मृति लब्धा माना पूरी दुनिया से मोह नष्ट क्र दो | जो शंकर को दिखाया है बैरागी, बी माना बिपरीत और राग माना प्यार, जिसका इस दुनिया से मोह मिट गया| तो भी तो भगवान् होगा न जिसका कोई के प्रति किसी भी प्रकार का कोई भी आकर्षण नही| अब शंकर को तो यहाँ बैरागी दिखाया और गीता में श्लोकी आया है ( यदा ते मोह कलिल्म बुद्धिर्ब्यातित रिष्यति / तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतो वश्यो श्रोताश्यो च) अर्थ लिखा की जब तेरी बुद्धि सुनी – सुने बातो के मोह रूपी किचर को पर कर जायेगी तब परम बैरागी को तू प्राप्त हो जायेगा| तो उसकी बुद्धि कौनसे सुनी सुने बातो से पर हो गयी| बो बात है की भगवान् सर्ब्व्यापी नहीं एक ब्यापी है| जो की गीता में लिखा (न त्वम् तेषु ते मयी) अर्थ – मई सबमे नहीं हु लेकिन सब अपने मूल शुद्ध स्वरुप में मेरे साकार स्वरुप में उपस्थित है|

  10. महादेव का अनेक नाम है शास्त्र में, और नाम काम के आधार पर परता है| तो उसका बहत सारे नाम है जैसे – योगिराज (सब योगियों का राजा), अमरनाथ (जो अमर है), जिसका कोई आदि या अंत नहीं| गोपेश्वर (गोपिओ का इश्वर),महाकालेश्वर (जो महान ते महान काल/ कालो का भी काल है) तो उसकी मृत्यु हो ही नही सकती तो भगवान् तो बोही होगा न| रामेश्वर ( राम का इश्वर ) और राजेश्वर(राजाओ का इश्वर, इश्वर माना इश माना शासन करता और वर माना श्रेष्ठ ) माना जो राजाओ का भी राजा है और सब राजाओ में श्रेष्ठ से श्रेष्ठ राजा है| और भी बहत सरे नाम है जैसे विश्वनाथ ( प्योर विश्व को नाथने वाला) और विश्वपति (जो पुरे विश्व का जो पति है)| और विश्वपति सिर्फ एक भगवान को खा जाता है| तो ये सारे टाइटल शंकर के साथ लगाए जाते है| 

  11. एक पुराना कहावत है की old is gold तो जब द्वापरयुग शुरू हुआ तो तब ये कृष्ण, दुर्गा, गणेश, हनुमान आदि-आदि देवी-देवताओ की पूजा नही होती थी तब सिर्फ एक सिव लिंग की पूजा होती थी जिसका मंदिर सोमनाथ में था, वहा एक लाल पत्थर की मूर्ति थी जिसमे हीरे जरे हुए थे| फिर वाद में आदि-आदि देवताओ की पूजा शुरू हो गयी| तो जो पुराना होगा वाही तो भगवान् होगा न|

  12. और एक वात है की आज तक दुनिया में जितनी भी खुदिया हुई है (हरप्पा, मोहन जोद्रो में) या दुनिया के किसी भी प्रान्त में वहा ज्यादा से ज्यादा शंकर का सारभौम यादगार, लिंग मूर्ति मिली है|

भगवान बो होगा जो न कभी जन्मेगा और न मरेगा और उससे ही सम्पूर्ण सृष्टि विस्तार प्राप्त होगा जो गीता के 10/3 श्लोक में लिखा है (अविनाशी तू तत्बिद्धि येन सर्ब मिदम ततं /बिनाश्माब्ययेस्यास्य न कश्चित् कर्तुम मर्हसी) और गीता के और एक श्लोक में लिखा है (अहम बीज प्रद:पिता) माना मई ही बीज डालने बाला पिता हु|

  1. विष्णु और शंकर में कौन ऊँचा? विष्णु को हमेशा ज्ञान जल में दिखाते है और शंकर को याद में, तो इन दोनों में कौन ऊँचा है? तो इसके लिए गीता में लिखा है 12/12 श्लोक में (ज्ञानत ध्यानंम विशिष्यते) अर्थ – ज्ञान से ध्यान विशेष है| और शंकर को ध्यान में बैठा दिखाते है तो शंकर विष्णु से ऊँचा हुआ|

14.शंकर ही ऐसा है जिसके लिए दिखाया की उसने कम-देव को भस्म किया| जो गीता में 7/25 नंबर श्लोक में लिखा (नाहं प्रकाश सर्बस्य योग माया समाब्रिता अर्थ – मई सब लोगो के सामने सदा प्रकट नही हु, योगमाया से ढका हुआ हु| अब ये योगमाया क्या है जो गीताके 3/37 नंबर श्लोक में लिखा (काम एष क्रोध एष रजोगुनो समुदभब: / महाशनो महापाप्मा बिध्येन्मिह बैरिनम) अर्थ – ये रजोगुण से उअत्पन्न ये काम अथबा ये क्रोध भुत भोग चाहता है और बरा पापी भी है इस संसार में इसे बैरी समझ| तो सिर्फ शंकर को ही दिखाया जिसने काम देव को भस्म किया तो बो भगवन हो गया न|


15.एक शंकर के ली कहा गया है की जब समुद्र मंथन हुआ तो जो हालाहाल बिष निकला उसे शंकर ने पिया क्योकि उसे पिने बाला कोई नहीं था| अब एक मेरा आप सब के प्रति सवाल है की शंकर तो बिष पाई है तो बो पवित्र कैसे होगा और अगर पवित्र नहीं हुआ तो बो भगवान् भी नही कहा जाएगा? क्योकि भगवन तो पवित्रता का सागर है|

 शंकर को हमेशा याद में बैठा दिखाते है, जो उसे योगिराज कहा जाता है, लेकिन उसमे ज्ञान कहा? अगर उसमे ज्ञान नही होगा तो उसे पवित्र भी नही कहा जायेगा, क्योकि गीता में 4/8 नंबर श्लोक में लिखा गया है की (नही ज्ञानेन सदृशम पवित्रं इह विद्यते) माना इस संसार में ज्ञान के सामान कुछ भी पवित्र नहीं| तो उसमे ज्ञान है ये कैसे सवित करेंगे?

Ans. गीता में 5/4 नंबर श्लोक में लिखा गया है की (सांख्ययोगो पृथग्बाला प्रबदंति न पंडिता: / एकमप्यास्थित: सम्यगुभर्योबिन्ध्यते फलं) माना कच्ची बुद्धि बाले समझते है की ज्ञान और योग ये दोनों अलग है, लेकिन इनमे से एक का भी आसरा करने बाला दोनों का ही फल पाता है| और उसके बाद बाले श्लोक में 5/5 नंबर श्लोक में लिखा है (यात्संख्ये प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते / एकम सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति) अर्थ -  ज्ञान द्वारा जो पद मिलता है बही पद योग द्वारा भी मिलता है| ज्ञान और योग को जो एक देखता है, बही सत्य देखता है| तो इस दृष्टि से देखा जाये तो बो याद में 100% है तो उसमे ज्ञान भी 100% है| और दूसरा ये है की बो जिसे याद कर रहा है उसे 100% जानकर ही तो याद कर रहा है| और ज्ञान माना भी जानकारी भी है, किसकी जानकारी? सच्चाई की जानकारी | तो ऐसे बो याद में 100% है सो ज्ञान में 100% सो बो पवित्रता में भी 100% हो गया| तो बो भगवान् हो गया| और एक श्लोक गीता में आया है की (ग्यानात्ध्यानाम विशिस्य्ते) अर्थ – ज्ञान से ध्यान विशेष है, और शंकर को हमेशा ध्यान में दिखाया जाता है| 

अब और एक सवाल है की बो तो बिष पिता है? तो बो भगवान् कैसे हो गया| विष माना ही जो पराई स्त्री का भोग करे| और बिष 5 बिकारो को भी कहते है| तो बो तो बिक्री हो गया| पर भगवान् कहते है की मै न पाप करता हु न पुन्य करता हु और न इनका मै भोग लेता हु| तो शंकर बिकारी ठहरा, तो उसे भाग्वान कैसे कहे? तो इसका जबाब है की दुसरे जितने भी देवी-देव्ताए है उनका कोई न कोई अंग पूजा जाता है जैसे हस्तकमल, नेत्रकमल, पदकमल और कृष्ण के भी पुरे देह की पूजा होती है| अब पूजा उसके उस अंग की होती है  जिसने जिस अंग के उपर विजय प्राप्त की हो| अब शंकर ने विष तो पिया लेकिन उसके लिंग की ही पूजा होती है और पुरे दुनिया में होती है और भी उसका सार्भौम यादगार है| जीके ली गीता में श्लोक हे ( मया ततमिदं सर्बम जगत अब्यक्तमुर्तिना) अर्थ – मेरे बिस्तृत लिंग मूर्ति के द्वारा ये सम्पूर्ण बिश्व बीज से बृक्ष की भाती विस्तृत हुआ है| और जिसने जिस अंग में जित पाया तो उसके उस अंग की पूजा होती है| इसका मतलब उसने उस अंग में जीत प्राप्त की है| मतलब बो उस अंग से कर्म करता है लेकिन उसका भोग नही लेता अगर बो कर्म न भी करे तो उस कर्म में उसकी आसक्ति भी नही है जो गीता के 2/47 नंबर श्लोक में लिखा है ( कर्मंयेबाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन / माकर्म फल हेतुर्भुर्मा ते संगोस्तु कर्मणि) अर्थ – तुम्हारे कर्म योग में ही अधिकार है वर्तमान कालीन फ्लो में कभी भी नहीं इसलिए कर्म फल का हेतु उत्पादक मत बनो और तुम्हारे कर्म न करने में भी आसक्ति न हो | एसा ही गीता के 4/14 नंबर श्लोक में (न मां कर्माणि लिम्पन्ति न में कर्मफले स्पृहा / इति मां यो भी जानाति कर्मभिर्नम स बध्यते) अर्थ – न मुझे कर्मो का लेप लगता है और न मुझे कर्मो के फल में इच्छा है | इस रूप में जो मुझे जान लेता है बो कभी कर्मबंधन में नही बंधता| और एक श्लोक में लिखा है 4/6 में (अजोपी संन्यब्यायात्मा भुतानामी स्वरोपी सन / प्रकृतिम स्वामधिस्ताय सम्भम्यात्म्माय्या) अर्थ – जिस आत्मा की शक्ति का कभी ब्याय न हो, भ में शिव-शंकर अजन्मा होते हुए भी प्राणियों में श्रेष्ठतम शासन करता हु|


कहा जाता है कर्मो में युक्तियुक्त कुशलता ही योग है, तो बो शंकर कौनसे कर्म में कुशल है, क्योकि उसे योगिराज दिखाते है? जो गीता में कहा गया ये जो राजविद्या है बो राजाई की विद्या है और ये गुह्य ते गुह्य है|


  1. शंकर के साथ ही शिव का नाम जोर जाता है, शिव माना ही कल्याण करी, जो सबका कल्याण करता है जिसके लिए कहा गया कालातीत , कल्याण , कल्पान्तकारी | उसके लिए ही कहा जाता है शिव-शंकर भोले भले| यह शिव के साथ भोला और शंकर के साथ भला का तितिले लगाया जाता है| 



  1. अब एक बात और है की शंकरको बह्य्ग्वान कैसे कहे उसे तो हमेशा याद में बैठा दिखाते, अब भगवान् जो होगा बो किसीको थोरे ही याद करेगा बो तो खुद ही भगवान् है? तो बो हमेशा शिव की याद में बैठा रहता है, बो अजन्मा है, बो इस जन्म – मृत्यु के चक्र में नहीं आता | बो अनु से भी अनु है जिसके लिए गीता के 8/9 नंबर श्लोक मवे लिखा है (कबिम पूरण मनुशासित अनिरानियामासम अनुस्मारेद्य अर्थ – बी अनु से भी अनु है| बो जो शंकर है बो बह्ग्वान जैसा वनता है | बो शिब जैसा 100% बनता है| क्योकि टीचर क्लास में जितने भी बच्चो को परायेगा उनमे से कोई न कोई तो अब्ब्बल नंबर पास होगा | बो भी शिब सामान अजन्मा, अकर्ता, अभोक्ता, असोचता बनता है| अपना शारीर रहते भी बो उसे भूल जाता है और आत्मिक स्थिति धारण कर लेता है| तो बो भगवान् जैसा वनता है लेकिन हम उसे भगवन्न से अलग नहीं कर सक्तेव| क्योकि अगर घर में कभी बाप मर जाता है तो जो बरा बच्चा होता है बो ही बाप सामान बन कर बैठ बजाता है| उसके लिए ही कुँरण में लिखा है आदम को खुदा मत कहो आदम खुदा नहीं लेकीन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं| उसके लिए ही गीता में श्लोक में आया है इदम शरीरम कौन्तेय क्षेत्रम मिटी बिधियते अर्थ – जो इस क्षेत्र और क्सेत्र्ग्य को ज्ञान को समझ ले उसे और किसी ज्ञान की जरुरत नहीं क्योकि ये क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है| क्षेत्र माना शंकर का शारीर उर्पी रथ जिसे क्षेत्र कहा गया है और उसमे प्रवेश करने वाला क्षेत्रग्य बो कौन है? बो है शिव और शंकर का विष्णु रूप जब दोनों का स्वाभाव- संस्कार और भैब्रेशन मिलकर एक हो जाता है|  एक शिव के लिए ही कहा जाता है कलातीत , कल्याण , कल्पान्तकारी| यानि बो कल्पान्त में आता है और पुरे कल्प का उद्धार करके जाता है|

  2. इन सबके बाद भी गीता में लास्ट में लिख दिया की कृष्ण गीता का भगवान है| ये जो बाद में विद्वान – पंडित – आचार्य जो कृष्ण के भक्त थे उन्होंने गीता में कृष्ण का नाम डाल दिया| गीता तो पहले निराका वादी शास्त्र था ये बाद में आने बालो ने गीता को सकरवादी बना दिया| अगर गीता निराकारवादी शास्त्र हो जार तो दुनिए के बाकि सरे धर्म भी गीता को मानेंगे, भगवन निराकार है, बाकी धर्म बाले भी भगवान् को निराकार मानते| और कृष्ण भगवान नहीं हो सकता क्योकि उसके लिए नहीं कहा गया उससे सम्पूर्ण विश्व विस्तार प्राप्त हुआ| क्योकि गीता में लिखा 9/4 नंबर श्लोक में लिखा की मेरे लिंग मूर्ति द्वारा यह सारा विश्व विस्तार प्राप्त हुआ| कृष्ण की तो मूर्ति की पूजा होती है| और बाकि जितने भी 33 करोड़ देवी – देवताए है उनमें से किसीकी भी लिंग की पूजा नहीं होती | एक शंकर ही है जिसकी सिर्फ लिंग की ही पूजा होती है| तो इसका मतलब उसीसे सम्पूर्ण विश्व विस्तार प्राप्त हुआ तो उसे ही भगवान् कहेंगे|

  3.  अब हम शंकर को याद करे या बकिओ को याद करे जैसे एक पेड़ है उसमे हम सिर्फ बीज को ही पानी देते है, सरे पत्तो को पानी नहीं देते क्योकि बीज से ही सम्पूर्ण विश्व विस्तार प्राप्त होता है जो गीता के 2/17 नंबर श्लोक में लिखा है सब प्राणियो का सनातन बीज मुझको जान| जो की गीता के 15/4 नंबर श्लोक में लिखा है की ( त्वमेव चाद्यम पुरुषम प्रपद्दे यत: प्रबृत्ति: प्रसृता पुराणी) अर्थ- उस अदि-पुरुष अर्ध-नारीश्वर महादेव का शरण लेना चाहिए, जिससे इस सृष्टि बृक्ष की पुराणी देवी – देवता धर्म की प्रक्रिया प्रसारित हुई|

  • अब ये जो शंकर पार्ट धरी है बो प्रक्टिकल में अभी इस सृष्टि पर अब्तारीर हुए है और अभी ये तमोप्रधान कलियुग का विनाश होने बाला है और सत्ययुग आने बाला है|

  • अब इससे पहला ही सबाल ये आता है की अभी कलियुग का विनाश कैसे हो सकता है? शास्त्र वादियों ने तो लिख दिया की कलियुग तो अभी बच्चा है, अभी तोह कलियुग का आदि है| अभी मध्य फिर अंत आएगा| तो अभी कलियुग का विनाश कैसे हो सकता है?

इसका जबाब है की कलियुग का आयु जो शास्त्र्वदियो ने करोरो बर्ष बता दिया बो करोरो बर्ष नहोई सिर्फ 1250 बर्ष का ही है| अब इसका प्रूफ क्या है? 

  1. पहला प्रूफ ये है की ब्रह्मबैबर्ट पूराण में लिखा हुआ है की हर युग की आयु 1250 बर्ष की है और एक कल्प की आयु है 5000 बर्ष| जो अभी कलियुग ख़त्म होने को आया है|

  2. दूसरा प्रूफ है की  दिल्ली में जो विरला मंदिर है (लक्ष्मी – नारायण का) उस मंदिर के मुख्य द्वार्मे ही लिखा है की ये कल्प 5000 बर्ष का है|

  3. तीसरा बाइबल में लिखा हुआ है की क्रिस्ट के जन्म के 3000 बर्ष पहले इस सृष्टि प्र स्वर्ग / हेवन था| क्रिस्ट का जन्म आज से २००० बर्ष पहले हुआ था और उसके 3000 बर्ष पहले माना कुल मिलाके क्रिस्ट के जन्म के 5000 बर्ष पहले इस सृष्टि पर स्वर्ग था| 

  4.   शास्त्र में कहते है जो महाभारी – महाभारत युद्ध हुआ था बो युद्ध भी आज से 5000 बर्ष पहले हुआ था|

  5. साइंस कहता है की दुनिया में सिर्फ एक भारत में ही जो पहली नगर सभ्यता का आरम्भ हुआ था जिसे हम हरप्पा और मोहन्जोद्रो के नाम से जानते है बो नगर भी आज से 5000 बर्ष से ज्यादा पुराना नहीं है|

अभी भगवान् क्यों आते है? क्योकि अभी इस सृष्टि का विनाश होगा और एक नए सृष्टि की स्थापना होगी, अभी ये पुराणी दुनिया से एक नै दुनिया आयेगी अभी जैसे घोर तमोप्रधान युग चल रहा है – सब देह्भानी हो गये, मनसा, बचा, कर्मणा सबका गन्दा हो गये तो अभी फिर एक दम प्योर नै सृष्टि आयेगा, जहा सिर्फ देवताए रहते है| पूरा उल्टा हो जाएगा | जो गीता में लिखा जगत बिप्रिवार्ताते अर्थ – मेरे आने के बाद जगत बिपरीत गति से उपर उठता है| तो शास्त्र में कृष्ण को दिखाया की उसने द्वापरयुग में आकर अर्जुन को ज्ञान दिया तो फिर उस्केव बाद ये कलियुग क्यों आया, सत्ययुग आना चाहिए था न| तो भगवन सिर्फ कलियुग के लास्ट में आते है| और हर बार कलियुग के लास्ट में ही आते है और मनुष्यों को पतित से पवन बनाकर नै दिनिया में भेजते है| जिसके लिए गीता में लिखा है कल्प – कल्प लगी प्रभु अवतारा| अर्थ – हर कल्प-कल्प में एक बार करके प्रभु अवतार लेते है| ( इन सबसे ये प्रूफ हो जाता है की ये सृष्टि  5000 बर्ष से ज्यादा पुराना नहीं है| और ये कलियुग भी सिर्फ 1250 बर्ष का ही है|)


अब जो और एकी दूसरा सबल आता है की भगवन भारत में ही क्यों आते है, दुसरे – दुसरे कितने शक्तिशाली देश आज है जैसे आमेरिका , ऑस्ट्रेलिया , रूस लेकिन भगवान् उसमे न आकर भारत में क्यों आते है? तो प्रूफ है की 

  1. गीता में लिखा है की यदा – यदा ही धर्मस्य \ ग्लानिर्भाबती भारत: यानि जब – जब धर्म की ग्लानी होती है, भारत की ग्लानी होती है तब – तब मई आता हु| अब ये भारत थ्री न स्थूल भारत की वाट की गयी है, ये तो कविओ की आलंकारिक भाषा है| यह एक भारत पर्सनालिटी की बात की गयी है भारत माना ज्ञान की रौशनी में लगा रहने बाला| तो उस भारत की जब ग्लानी ओटी है तब मई आता हु| यह मई कौन है? मई माना शिव बाप जो हर कल्प बाद सिर्फ कलियुग और सत्ययुग के संधिकाल में आता है| जब उसके बिरुद्ध tv. Radio, internet, newspaper sab jagah me glani hoti hai|जिसके उपर बहत कलंक लगता है जिसेव शास्त्र में दिखाया है एसा अवतार जो कलियुग में अवतरित होता है और उसके उपर कलंक ही कलंक लगता है तो उसका नाम पर गया कलंकी धर अवतार| तो बो कौन है? बो भारत में जन्म लेता है| अब भारत तो इतना बार देश है तो इस भारत में बो कहा जन्म लेता है? बो u.p में जन्म लेता है| जहा सरे प्रश्नों का उत्तर मिलता है| और यूपी में जन्म लेते क्योकि सबसे ज्यादा तीर्थ, नदिया, जगतगुरु और महामंडलेश्वर भा सबसे ज्यादा है| u.p में ही विशेष तीर्थ स्थान है हरिद्वार| यानि हरी का द्वार दिखने बाला | और u.p में ही हिन्दू शास्त्र के बारे बारे भगवानो का जन्मभूमि भी भा है| कृष्ण का मथुरा , राम का अयोध्या और शंकर का कशी| कशी माना काश्य को पिने / धारण करने बाला| काश्य माना तेज, किसका तेज| याद के तेज को पिने बाला| 

  2. अब बो u.p में भी कहा जन्म लेते है? फरुर्खावाद में| झा में लोग सबसे ज्यादा मालिक को मानते है| और बो तो प्योर बिश्व का मालिक है |

  3. फरुर्खा वाद में भी कहा? कम्पिल जिसे पहले काम्पिल्य कहते था बहा ऋषि कपिल मुनि का आश्रम था | जहा दिखाते की अग्यात्वास के समय पांडवो ने उस आश्रम में आश्रय लिया था| भगवान बहा आते है| 

  4. अब भगवान् भा क्यों आते? जहा सही से प्योर 24 घंटे बिजली भी नहीं रहती, जहा किशानो की इतनी दुर्दशा है की उन्हें दिन की दो बक्त की रोटी भी ठीक से नहीं मिल पति, तो बीहाँ भगवान् क्यों आते ? क्योइकी भगवान् उसमे आते है जो इस सृष्टि का पतितं कमी कांता हो तो उसे आकर पावन बनाते है| अब भगवान् किसी पवन को पवन बनाएगा तो दुनिया थोरे ही मानेगी| 

  5. तो अभी हमे उस भगवान् को याद करना है क्योकि अभी ये कलियुग विनाश होने वाला है| भगवान जब आते है ताब एक तरफ विनाश और दूसरी तरफ स्थापना का काम शुरू कर देते है| भगवान् के आने के बाद से विनाश का सामान तैयार होने लगता है क्योकि उसके आने के पहले एटम बम का तो कोई भी नाम – निशान नहीं था| सृष्टि के विनाश होने के 100 बर्ष पहले भगवान् आते है , क्यों? क्योकि भगवान् एसा धर्मपिता है जो की धर्म के साथ – साथ रजाई भी स्थापन करता है| और हर धर्म पिट को अपना धर्म स्थापन करने के लिए 100 बर्ष लगता है| तो उसे अभी याद करना है| क्योकि अभी कलियुग और सत्ययुग का मेल है, संगम्युग है| जिसे पुरुषोत्तम संगम्युग कहते है| जहा पुरुशार्ट करने के बाद हम उत्तम से उत्तम पद पाते है| इस पु . स . यु . में हमें उस शिव – शंकर के साकार रूप को याद करना है क्योकि इस युग को शास्त्र में पेरुशोत्तम मास कहते है| जहा सब अपने पितरो की पूजा करते है, और उन्हें याद करते है| तो हमारा बरे ते ब्रा पितृ कौन हुआ, जो इस सृष्टि का आदिपुरुष है | तो अभी हमें उसे याद करना है| 


  1. जो गीता के 18/66 नंबर श्लोक में लिखा है (सर्ब धर्मं परित्यज्य मामेकम शरणम ब्रज) अर्थ – सब मैथ – पंथ – धर्म – सम्प्रदायों को त्याग कर मुझ एक की शरण में आ जा| अब उसके शरण में कैसे जाए, बो तो हमारे सामने है नहीं , ये मन – बुद्धि की वाट है| उसे हमेशा मन से याद करते रहना है| 

  2. जो गीता में लिखा है 18/६५ नंबर श्लोक में (मनमाना भाव मद्भक्तो मद्याजी मम नमस्कुरु) अर्थ – मेरे में मन लगाने बाला, मुझे भजने बाला , और मुझे नमस्कार करने बाला बन जा इससे तू मुझे पा लेगा|         तो अब हम उसे प्राप्त कैसे करे / उसे याद कैसे करे क्योकि उसका तो कोई रूप नहीं है, बो तो अनु से भी अनु है| 

  3. उसके लिए गीता के 13/17 नंबर श्लोक में लिखा है की (ज्योतिसामापी ताज्योती सतमास: परम उच्यते / ज्ञानम ज्ञेयम ज्ञान गम्यम हृदि सर्बस्य विष्ठितम) अर्थ – यह शिव – शंकर ज्योतिमान नक्षत्रो की भी ज्योति है, और अंधकार से परे कहा जाता है| भ ज्ञान है , जान्ने योग्य है और ज्ञान द्वारा ही जाना जाता है| तो अभी जो कल्पान्त कल चल रहा है उसमे अभी हमें उसे याद करना है|

  4. जो गीता में लिखा है ( 8/5 नंबर श्लोक में (अन्तकाले च ममेब स्मरण मुक्त्वा कलेवरम / य: प्रयाति स मद्भाब्म यति नश्त्रस्य संसय अर्थ -  कल्पन्त्काल में जो इस शिव – शंकर को याद कर्तुआ शारीर को चोरता है बो प्रक्रिस्ट प्रयाण गति को पाटा है और बो ही मेरे ईशित्व भाव को पाटा है|    तो अभी हमे उस शिव – शंकर के इस सृष्टि में अवतरित प्रैक्टिकल रूप को याद करना है |  अभी अगर हम उसे याद नहीं करेंगे तो 


उसके लिए गीता के 16/20 नंबर श्लोक में लिखा है ( आसुरिम योनिमापन्ना मुधा जन्मनी – जन्मनी) अर्थ – बो कलियुगी आसुरी गुणों बाली मनुष्य योनी को प्राप्त हुए मुद जन मुझको न पाकर बहा से अधम गति को ही पते है|   






(ॐ    शांति) 




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