माया (जगदम्बा) ने बाप को ठगा। बाप विचारे ठग्गूराम ठगे रह गये, कहती है-जीवन संगिनी बनूंगी, फिर निभाती नही है। बीच मे छोड़ के चली जाती है।
*माया (जगदम्बा) ने बाप को ठगा। बाप विचारे ठग्गूराम ठगे रह गये, कहती है-जीवन संगिनी बनूंगी, फिर निभाती नही है। बीच मे छोड़ के चली जाती है*👇
_*माया की जो फारकती चलती है, माया फारकती दिलाए देती है, वो माया कौन हुई? माया न आती तो अच्छा था, जिंदगी में ये आया, तो, तो ये गड़बड़ हो गया। माया ठगनी होती है कि सच्ची होती है? क्या होती है माया? ठगने वाली होती है कि सच्ची होती है? ठगने वाली होती है। तो माया ठगनी है। कैसी ठगनी? कहती है, क्या? कि हम, हम साथ निभाएँगे। जीवन संगिनी बनेंगे। क्या? फिर बीच में छोड़ के चली जाती है कि जीवन संगिनी बनती है? तो ठग लिया कि नहीं ठग लिया? बिचारे ठग्गू, ठग्गूराम ठगे रह गये! तो देखो माया फारकती दिलाए देती है।*_
_*★ तो बताया, ये माया की जो फारकती चलती है, माया फारकती दिलाए देती है, वो माया कौन हुई? नहीं आया होता तो अच्छा था! जिंदगी में ये आया, तो, तो ये गड़बड़ हो गया। क्या? माया उसे कहते हैं- माया ठगनी होती है कि सच्ची होती है? क्या होती है माया? ठगने वाली होती है कि सच्ची होती है? ठगने वाली होती है। तो माया ठगनी है। कैसी ठगनी? कहती है, क्या? कि हम, हम साथ निभाएँगे। जीवन संगिनी बनेंगे। क्या? फिर बीच में छोड़ के चली जाती है कि जीवन संगिनी बनती है? तो ठग लिया कि नहीं ठग लिया? बिचारे ठग्गू, ठग्गूराम ठगे रह गये! तो देखो माया फारकती दिलाए देती है। अब समझे माया किसे कहा जाता है? किसे कहा जाता है? जो आदि से अंत तक साथ ना निभाए, सिर्फ़ दिखावा करे कि मैं जीवन संगिनी बनूँगी या जीवन साथी बनूँगा, भाई के रूप में, मित्र के रूप में लेकिन फिर साथ ना निभाए। (time@57.30-1.00.25) dt 15.06.2020*_
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