अभी परमात्मा है, सम्पन्न हो गया, ये कहना- अज्ञानी भगत है।

 *अभी परमात्मा है, सम्पन्न हो गया, ये कहना- अज्ञानी भगत है*👇


_*क्या अभी परमात्मा हो गया?? सम्पन्न बनने के बाद कहो ना। अभी क्यों कहते हो? अभी कहना ये अज्ञान है की ज्ञान है?? अभी तो कहते हैं सो अज्ञानी भगत हैं। उनको पता ही नहीं है कि हम देहधारी की भक्ति कर रहे हैं। परमात्मा जो कहा जाता है परम पार्टधारी संसार में साबित हो जाएगा, हर मनुष्य आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच की 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएँ भी ये स्वीकार कर लें, क्या? कि ये हीरो पार्टधारी है। तब ही कहेंगे हीरो पार्टधारी परमात्मा कि पहले से ही कहेंगे? और अगर अभी सारी दुनिया ने तो माना ही नहीं।*_


 _★ (बाबा मैं गलत लिखा था अभी सिर्फ़ तीन चम्मच ही खा रहे हैं। तो गलत नहीं है क्या? खा रहे हैं ना? भोगी है कि नहीं? क्या? नहीं भोगी है?) हाँ, अच्छा समझो बाबा मिसाल देते हैं- *अहमदाबादी साधु का ना खाता है, ना पीता है, ना हगता है तो क्या परमात्मा हो गया? हो गया? नहीं हो गया। क्यों? क्यों नहीं हो गया? अरे, हाँ तो सम्पन्न बनने के बाद कहो ना, अभी क्यों कहते हो? अभी कहना ये अज्ञान है या ज्ञान है? अभी तो कहते हैं सो अज्ञानी भगत हैं। उनको पता ही नहीं है कि हम देहधारी की भक्ति कर रहे हैं। परमात्मा जो कहा जाता है परम पार्टधारी संसार में साबित हो जाएगा, हर मनुष्य आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच की 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएँ भी ये स्वीकार कर लें, क्या? कि ये हीरो पार्टधारी है। तब ही कहेंगे हीरो पार्टधारी परमात्मा कि पहले से ही कहेंगे? और अगर अभी सारी दुनिया ने तो माना ही नहीं।* परमपिता कहेंगे तो आत्माओं का पिता साबित होता है और मनुष्यों का पिता आदम कहेंगे तो आदम को अभी सब धर्म के धर्मपिताओं ने पहचान लिया? उन्होंने ही नहीं पहचाना। अरे! उनके आधारमूर्त जो देवात्माएँ बनते हैं, उन्होंने भी नहीं पहचाना और उनकी भी जो बीज-रूप आत्माएँ, जड़ को आधार कहा जाता है  ना! उनको भी जन्म देने वाले जो बीज हैं, उनको मालूम पड़ गया कि परमात्मा कौन है? मालूम पड़ गया? हाँ, *अभी इस दुनिया में कोई भी नहीं है, जिसने पूरी-2 रीति परमपिता परमात्मा को पहचाना जब तक फाइनल पेपर का रिज़ल्ट ना आए तब तक कहेंगे कि पास हो गया नष्टोमोहा स्मृतिलब्धा के पेपर में? कोई पास हुआ? नहीं कोई, किसी को, मनुष्यमात्र को नहीं कहेंगे कि नष्टोमोहा स्मृतिलब्धा के पेपर में कोई पास हो गया है। तो देखो, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य इतना बोलते हैं; लेकिन उसका क्या है? बस, सुनी-सुनाई बातें हैं, उन सुनी-सुनाए लफ्जों को बोलते रहते हैं, शब्दों को।* बाबा ने सैकड़ों बार/दफह सुना होगा इन द्वारा, क्या? ब्रह्मा बाबा ने सुना होगा, क्या? ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। अर्थ कुछ भी पता नहीं। ज्ञान को पहले क्यों रख दिया? भक्ति को बीच में क्यों रख दिया और वैराग्य को सबसे बाद में रख दिया, क्यों? फिर कहते हैं- देव-देव महादेव। अरे! ना खुद जानते तो कोई से पूछेंगे कैसे? पूछेगा कौन? अरे, जो जानता होगा सो पूछेगा तो देखो, ये जो ज्ञान, भक्ति, वैराग्य है ना! बस, ये डब्बे में ठिकरी है। कौन-सा डिब्बा? ये शरीर रूपी डब्बे में ये ठिकरी पड़ी हुई है। ठिक्कर बुद्धि है या चैतन्य आत्मा बनी? नहीं बनी ना! *समझ कुछ भी नहीं है बस, सुनते आए हैं और बाप कहते हैं कि सुनी-सुनाई बातों से भारतवासियों ने दुर्गति पाई। सिर्फ़ सुना, दूसरों को सुनाए दिया। किसी को समझ में आया, अपन को समझमें आया या नहीं आया तो फायदा है? फायदा हो नहीं सकता। तो देखो, जो सुनते आए हैं वो ही पीछे बैठ करके सुनाते रहते हैं अभी बाप बाद में आ करके समझाते हैं।* (time@34.18-39.41) dt 26.03.2020 ॐ शान्ति!_

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