मुरलियों से गीता के भगवान के सिद्ध करने की प्वाइंटस।
साकार मुरलियों से गीता के भगवान को सिद्ध करने की प्वाइंटस (क्रमश: पार्ट 4)
1- मन्मनाभव, मध्याजीभव.. यह गीता के कोई-कोई अक्षर ठीक हैं क्योंकि बाप जो तुमको अभी ज्ञान सुनाते हैं वह फिर प्राय:लोप हो जाता है। कोई को पता ही नहीं रहता कि गीता ज्ञान से श्रीकृष्ण ने यह पद पाया है।
2- जब सतयुग में इन्हों को (देवताओं का) राज्य था तब और कोई धर्म नहीं था। उस समय जनसंख्या भी बहुत थोड़ी थी। तो जरूर गीता ज्ञान के बाद विनाश भी चाहिए। इसलिए महाभारत लड़ाई भी गाई हुई है। इसमें ही सब चेंज होनी है। कलियुग के बाद सतयुग आना है।
3- अभी कहते हैं कि यह महाभारत काल चल रहा है, तो जरूर भगवान भी चाहिए। कृष्ण तो हो न सके। गीता ज्ञान से तो कृष्ण की आत्मा को राजाई मिली। इसलिए गीता है माता, जिससे तुम देवता बनते हो। तो कृष्ण की आत्मा गीता के ज्ञान से राजयोग सीखकर ऐसी बनी है।
4- पतित-पावन एक परमपिता परमात्मा को ही कहा जाता है, उन्हें ही सब पुकारते हैं। कृष्ण को कभी पतित-पावन समझकर याद नहीं करेंगे। अभी तुम जान गये हो कि कृष्ण की आत्मा जो सतयुग में थी वह अनेक रूप धारण करते-करते अभी तमोप्रधान बनी है फिर सतोप्रधान बनती है।
5- शिव भगवानुवाच, भगवान् कहते ही शिव को हैं। भगवान् एक ही होता है। कृष्ण तो बच्चा है। ज्ञान सुनाने वाला है बाप। तो बाप के बजाए बच्चे का नाम डाल देना, यह कितनी बड़ी भूल है। फिर कृष्ण के ही चरित्र आदि बैठ दिखाये हैं। बाप कहते हैं लीला कोई कृष्ण की नहीं है। गाते हैं – हे प्रभू तेरी लीला अपरम-अपार है, तो लीला एक की ही होती है।
6- शिवबाबा की महिमा बड़ी न्यारी है। वह है सदा पावन रहने वाला, परन्तु वह पावन शरीर में आ नहीं सकते। उनको बुलाते ही हैं – पतित दुनिया को आकर पावन बनाओ। तो बाप कहते हैं मुझे पतित दुनिया में, पतित शरीर में आना पड़ता है। इनके (श्रीकृष्ण के) बहुत जन्मों के अन्त में आकर प्रवेश करता हूँ।
7- शास्त्रों में श्रीकृष्ण को स्वदर्शन चक्र दिखाया है कि उसने स्वदर्शन चक्र से अकासुर-बकासुर आदि को मारा फिर राम को बाण दिखाये हैं। दोनों देवताओं को हिंसक बना दिया है। जबकि उनकी महिमा में गाते हैं देवतायें डबल अहिंसक हैं। न तो काम कटारी चलाते हैं, न क्रोध की हिंसा करते हैं। वह हैं ही निर्विकारी देवी देवतायें। इसलिए कृष्ण को मोर-मुकुटधारी दिखाया है।
8- कृष्ण को रूद्र नहीं कहेंगे। विनाश भी कोई कृष्ण नहीं कराते, स्थापना, विनाश और पालना यह तीनों कर्तव्य परमात्मा के हैं, परन्तु वह खुद कुछ नहीं करते, नहीं तो उन पर दोष पड़ जाए। वह है करनकरावनहार।
9- कृष्ण के लिए भगवानुवाच नहीं कह सकते, वह तो है दैवीगुणों वाला मनुष्य, डिटीज्म कहा जाता है। अभी देवी-देवता धर्म नहीं है, उसकी स्थापना हो रही है। अभी तुम ब्राह्मण, देवी देवता धर्म के बन रहे हो।
10- मनुष्य कहते हैं देवताओं का परछाया इस पतित सृष्टि पर नहीं पड़ सकता है, इसमें देवतायें आ न सकें। उनके लिए तो नई दुनिया चाहिए। लक्ष्मी का भी आवाह्न करते हैं तो घर की कितनी सफाई करते हैं। अब इस सृष्टि की जब सफाई होगी अर्थात् पुरानी दुनिया विनाश होगी तब देवी देवतायें इस सृष्टि पर आयेंगे। (मुरली 31.05.2017)
मुरलियों से गीता के भगवान को सिद्ध करने की प्वाइंटस) (पार्ट-1)
1) भगवान ने कल्प पहले भी कहा था, अभी भी कहते हैं कि मैं इस साधारण तन में, बहुत जन्मों के अन्त में इनमें प्रवेश करता हूँ, इनका आधार लेता हूँ। यह उस गीता में भी है कि – मैं बहुत जन्मों के अन्त में साधारण वृद्ध तन में प्रवेश करता हूँ। वह तन तो यह ब्रहमा का ही है।
2) गीता के भगवान की नॉलेज पुरूषोत्तम बनने के लिए मिलती है, गीता है ही धर्म स्थापना का शास्त्र, और कोई शास्त्र धर्म स्थापन अर्थ नहीं होते हैं। सर्व शास्त्रमई शिरोमणी है ही गीता। बाकी सब धर्म तो हैं ही पीछे आने वाले, उनको शिरोमणी नहीं कहेंगे।
3) वृक्षपति एक ही बाप है, वह पति भी है तो सबका पिता भी है। उनको पतियों का पति, पिताओं का पिता….. कहा जाता है। यह महिमा एक निराकार की गाई जाती है। कृष्ण की और निराकार बाप के महिमा की भेंट की जाती है। श्रीकृष्ण है नई दुनिया का प्रिन्स, वह फिर पुरानी दुनिया में संगमयुग पर राजयोग कैसे सिखलायेंगे!
4) बेहद का बाप ज्ञान का सागर, पतित-पावन है, वही गीता का भगवान है। वही ज्ञान और योगबल से नई दुनिया की स्थापना का कार्य कराते हैं, इसमें योगबल का बहुत प्रभाव है। भारत का प्राचीन योग मशहूर है।
5) ज्ञान है ही एक बाप (परमात्मा) के पास। ज्ञान से तुम नया जन्म लेते हो इसलिए गीता को माता कहा जाता है, जब माता है तो पिता भी जरूर होगा। तुम शिवबाबा के बच्चे हो वह है पिता, फिर गीता है माता। गीता का ज्ञान है ही नर से नारायण बनने के लिए।
6) अब गीता का भगवान कौन? अगर कृष्ण को कहें तो उन्हें याद करना तो बहुत सहज है। वह तो साकार रूप है। निराकार बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। श्रीकृष्ण तो ऐसे कह भी नहीं सकते कि मन्मनाभव, एक मुझे याद करो। तो अब बताओ गीता का भगवान कौन?
7) सारी दुनिया में मनुष्यों की बुद्धि में कृष्ण भगवानुवाच है। परन्तु कृष्ण थोड़ेही कहेंगे – मैं जो हूँ, जैसा हूँ, मुझे कोटों में कोई, कोई में भी कोई पहचान सकते हैं। कृष्ण को तो सब जान लेंगे। यह तो निराकार बाप ही कह सकते हैं।
8 ) ऐसे भी नहीं कि कृष्ण के तन से भगवान कहते हैं। नहीं। कृष्ण तो होता ही है सतयुग में। वहाँ भगवान कैसे आयेंगे? भगवान तो आते ही हैं पुरुषोत्तम संगमयुग पर जबकि कलियुग को बदलकर सतयुग बनाना है।
9) तुम्हारे पास बहुतों की लिखत हो कि गीता का भगवान कौन? ऊपर में भी लिखा हुआ हो कि ऊंच ते ऊंच बाप (परमात्मा) ही है, कृष्ण तो ऊंच ते ऊंच है नहीं। वह कभी कह नहीं सकते कि देह सहित देह के सब धर्मो को भूल मामेकम् याद करो। यह महावाक्य तो एक भगवान के ही हैं।
10) अभी तुमको मिलती है ईश्वरीय मत। ईश्वरीय घराने के अथवा कुल के तुम हो। ईश्वर आकर अभी दैवी घराना स्थापन करते हैं। देवी-देवताओं का धर्म फिर से स्थापन हो रहा है। जहाँ सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजाई चलती है। गीता से ब्राह्मण कुल और सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी कुल बनता है। अगर द्वापर में गीता सुनाई होती तो उसके बाद ब्राह्मण कुल वा सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी कुल आना चाहिए।
11) मनुष्य समझते हैं बहुत बड़ी प्रलय होती है। फिर सागर में पीपल के पत्ते पर कृष्ण आते हैं। अरे पीपल के पत्ते पर और सागर में कोई मनुष्य कैसे आ सकता। यह तो गर्भ महल की बात है, गर्भ महल से पहले-पहले श्रीकृष्ण की आत्मा अवतरित होती है। उनका जन्म होता ही है योगबल से, इसलिए उनको वैकुण्ठनाथ भी कहते हैं।
12) भगवानुवाच मैं तुमको राजयोग सिखलाकर राजाओं का राजा बनाता हूँ। तो पहले जरूर प्रिन्स कृष्ण बनेंगे। बाकी कृष्ण भगवानुवाच नहीं है। कृष्ण तो इस पढ़ाई की (राजयोग की) एम ऑब्जेक्ट है, यह पाठशाला है। [मुरली 01/05/2017]
( मुरलियों से गीता के भगवान को सिद्ध करने की प्वाइंटस ) (क्रमश: पार्ट 2 )
1- भगवानुवाच, मैं बहुत जन्मों के अन्त के भी अन्त में तुमको यह ज्ञान सुनाता हूँ फिर सो श्रीकृष्ण बनने लिए। इस पाठशाला का टीचर शिवबाबा है, श्रीकृष्ण नहीं। शिवबाबा जो मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है उससे पहले-पहले स्वर्ग के दो पत्ते राधे-कृष्ण निकलते हैं।
2- गीता के ज्ञान से तुम बच्चों की अभी तकदीर बनती है। बहुत जन्मों के अन्त में तुम जो एकदम तमोप्रधान बेगर बन गये थे, अब फिर प्रिन्स बनना है। पहले तो जरूर राधे-कृष्ण ही बनेंगे फिर उन्हों की राजधानी चलती है। स्वयंवर के बाद राधे-कृष्ण सो फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं।
3- गीता में है भगवानुवाच, परन्तु भगवान कौन है, यही भूल गये हैं। शिव के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। वास्तव में शिवबाबा सबको दु:ख से लिबरेट कर गाइड बन ले जाते हैं। श्रीकृष्ण तो किसी को लिबरेट नहीं करते, वह तो जब आते हैं तो उनके पीछे देवी देवता धर्म की आत्मायें ऊपर से नीचे आती हैं। देवताओं का घराना शुरू होता है।
4- गीता जो पढ़ते हैं उनसे पूछना चाहिए - मन्मनाभव का अर्थ क्या है? यह किसने कहा मुझे याद करो तो वर्सा मिलेगा? नई दुनिया स्थापन करने वाला कोई कृष्ण नहीं है। वह तो प्रिन्स है। यह तो गाया हुआ है ब्रह्मा द्वारा स्थापना। अब करनकरावनहार कौन? उनके लिए फिर सर्वव्यापी कह देते हैं।
5- बाप स्वयं आकर नई दुनिया की स्थापना करते हैं। एम आब्जेक्ट भी बिल्कुल क्लीयर है सिर्फ कृष्ण का नाम डालने से सारी गीता का महत्व चला गया है। यह भी ड्रामा में नूँध है। खेल ही सारा ज्ञान और भक्ति का है। तुम किसी से भी पूछो मन्मनाभव का अर्थ क्या है? भगवान किसको कहा जाए? जब ऊंच ते ऊंच भगवान है तो उनको सर्वव्यापी कैसे कहेंगे।
6- शिव भगवानुवाच, गीता में कृष्ण भगवानुवाच रांग है। ज्ञान सागर पतित-पावन शिव को ही कहा जाता है। ज्ञान से ही सद्गति होती है। सद्गति दाता एक ही बाप है।
7- मनुष्यों ने शिवबाबा के बदले श्रीकृष्ण का नाम गीता में दे दिया है, यह बड़े ते बड़ी एकज़ भूल है। नम्बरवन गीता में ही भूल कर दी है। बाप स्वयं आकर यह भूल बताते हैं कि पतित-पावन मैं हूँ, ना कि श्रीकृष्ण? तुमको मैंने राजयोग सिखलाए मनुष्य से देवता बनाया। गायन भी मेरा है - अकाल मूर्त, अजोनि....... कृष्ण की यह महिमा नहीं हो सकती। वह तो पुनर्जन्म में आने वाला है।
8- गीता में मैंने ही कहा है - मामेकम् याद करो। कृष्ण तो यह कह न सके। वर्सा मिलता ही है निराकार बाप से। अपने को जब आत्मा समझेंगे तब निराकार बाप को याद कर सकेंगे। मैं आत्मा हूँ, पहले यह पक्का निश्चय करना पड़े। मेरा बाप परमात्मा है, वह कहते हैं मुझे याद करो तो मैं तुमको वर्सा दूँगा। मैं सबको सुख देने वाला हूँ।
9- भगवानुवाच बाप समझाते हैं, भगवान पुनर्जन्म रहित है। श्रीकृष्ण तो पूरे 84 जन्म लेते हैं। उनका गीता में नाम लगा दिया है। नारायण का क्यों नहीं लगाते हैं? यह भी किसको पता नहीं कि कृष्ण ही नारायण बनते हैं। श्रीकृष्ण प्रिन्स था फिर राधे से स्वयंवर हुआ तब नाम बदलकर श्री लक्ष्मी, श्री नारायण होता है।
10- ऊंच ते ऊंच भगवान एक है, सभी उनको ही याद करते हैं। राजयोग की एम ऑब्जेक्ट यह (लक्ष्मी-नारायण) सामने खड़ी है। कृष्ण को कोई बाप नहीं कहेंगे, वह तो बच्चा है, शिव को बाबा कहेंगे। उनको अपनी देह नहीं है। मुरली 6/05/2017
( मुरलियों से गीता के भगवान के सिद्ध करने की प्वाइंटस) (क्रमश: पार्ट 3)
1- भारत के योग की बहुत महिमा है। परन्तु वह योग कौन सिखलाते हैं – यह किसको पता नहीं है। गीता में कृष्ण का नाम डाल दिया है। अब कृष्ण को याद करने से तो एक भी पाप नहीं कटेगा क्योंकि वह तो शरीरधारी है। शरीर पांच तत्वों का बना हुआ है, उनको याद किया तो गोया मिट्टी को, 5 तत्वों को याद किया। शिवबाबा तो अशरीरी है इसलिए कहते हैं अशरीरी बनो, मुझ बाप को याद करो।
2- तुम हे पतित-पावन कहकर याद करते हो, वह पतित-पावन भगवान रचयिता तो एक ही हुआ ना। अगर कोई मनुष्य अपने को भगवान कहलाते भी हैं तो ऐसे कभी नहीं कहेंगे कि तुम सब हमारे बच्चे हो। या तो कहेंगे ततत्वम् या कहेंगे ईश्वर सर्वव्यापी है। हम भी भगवान, तुम भी भगवान, जिधर देखता हूँ तू ही तू है। पत्थर में भी तू, ऐसे कह देते हैं। परन्तु तुम हमारे बच्चे हो, यह कह नहीं सकते। यह तो बाप ही कहते हैं – हे मेरे लाडले रूहानी बच्चों।
3- जैसे बैरिस्टरी, डॉक्टरी आदि सबके किताब होते हैं, ऐसे यह लक्ष्मी-नारायण भी पढ़ाई से बने हैं। इनका फिर किताब है गीता। अब गीता जिसने सुनाई, उसका नाम ही बदल दिया है। शिव जयन्ती मनाते हैं, परन्तु शिव ने गीता का ज्ञान देकर कृष्णपुरी का मालिक बनाया, यह नहीं जानते हैं।
4- कृष्ण स्वर्ग का मालिक था, परन्तु मनुष्य स्वर्ग को जानते नहीं हैं। इसलिए कह देते हैं कृष्ण ने द्वापर में गीता सुनाई। कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं, लक्ष्मी-नारायण को सतयुग में, राम को त्रेता में, उपद्रव लक्ष्मी-नारायण के राज्य में नहीं दिखाते। कृष्ण के राज्य में कंस, राम के राज्य में रावण आदि दिखाये हैं। यह किसको पता नहीं कि राधे-कृष्ण ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। बिल्कुल ही अज्ञान अन्धियारा है।
5- मनुष्य गीता सुनते हैं तो समझते हैं कृष्ण भगवानुवाच। कृष्ण के साथ सभी का प्यार है, कृष्ण को ही झूले में झुलाते हैं। अब तुम समझते हो हम झुलायें किसको? बच्चे को झुलाया जाता है, बाप को तो झुला न सकें। तुम शिवबाबा को झुलायेंगे? वह बालक तो बनते नहीं, पुनर्जन्म में आते नहीं। वह तो बिन्दु है, उनको क्या झुलायेंगे।
6- कृष्ण का बहुतों को साक्षात्कार होता है, कृष्ण के मुख में विश्व का गोला है क्योंकि वह विश्व का मालिक बनते हैं। तो मातायें विश्व रूपी माखन उनके मुख में देखती हैं।
7- गीता शिव भगवान ने सुनाई है, वही ब्रह्मा द्वारा राजयोग सिखलाते हैं। मनुष्य तो कृष्ण भगवान की गीता समझकर कसम उठाते हैं। उनसे पूछो कि कृष्ण को हाजिर-नाज़िर जानना चाहिए व भगवान को? कहते हैं ईश्वर को हाजिर-नाज़िर जान, सच बोलो। अब रोला हो गया ना। इससे तो कसम भी झूठा हो जाता है।
8- यह गीता ज्ञान स्वयं बाप (शिवबाबा) सुना रहे हैं। इसमें कोई शास्त्र आदि की बात नहीं है। यह पढ़ाई है। किताब गीता तो यहाँ है नहीं। बाप पढ़ाते हैं, किताब थोड़ेही हाथ में उठाते हैं। फिर यह गीता नाम कहाँ से आया? यह सब धर्मशास्त्र बनते ही बाद में हैं। सर्वशास्त्र मई शिरोमणी गीता गाई हुई है, गीता का ज्ञान नॉलेजफुल बाप पढ़ा रहे हैं। वह हाथ में कोई शास्त्र आदि नहीं उठाते हैं। वह तो कहते हैं बच्चे तुम मुझ बीज को याद करो तो झाड़ सारा बुद्धि में आ जायेगा।
9- मुख्य है गीता। गीता में ही भगवान की समझानी है। उसमें सबसे बड़ी बात है – याद करने की। घड़ी-घड़ी कहना पड़ता है – मन्मनाभव। अभी तुम गीता का ज्ञान सुन रहे हो। अभी गीता का पार्ट चल रहा है और बाप (भगवान) पढ़ा रहे हैं। भगवानुवाच, वह भगवान तो एक ही है। वह है शान्ति का सागर। रहते भी हैं शान्तिधाम में, जहाँ तुम आत्मायें भी रहती हो।
10- कृष्ण को गॉड फादर तो कह नहीं सकते। आत्मा कहती है ओ गॉड फादर, तो वह निराकार हो गया। निराकार बाप आत्माओं को कहते हैं कि मुझे याद करो। मैं ही पतित-पावन हूँ, मुझे बुलाते भी हैं – हे पतित-पावन। कृष्ण तो देहधारी है। मुझे तो कोई शरीर है नहीं। मैं निराकार हूँ, मनुष्यों का बाप नहीं, आत्माओं का बाप हूँ। (मुरली 11.05.2017)
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