सार सार को गहि रहे, थोथा देय उडाय। साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।

 *_सार सार को गहि रहे, थोथा देय उडाय। साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।_*


 _★ *शास्त्रों में झूठा ही झूठा है या सच्चा भी है, सार भी है??  अगर ना होता, तो बाप ऐसे क्यों कहते, कि मैं आता हुँ, शास्त्रों का सार सुनाता हुँ। तो सार है ना?* तो फिर वह कौनसी आत्मा हैं, *जो शास्त्रों में से वो सार अलग कर देती है, और पानी अलग कर देती है? हाँ??  गाते भी हैं-सार सार को गहि रहे, थोथा देय उडाय। साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सूप होता है ना? सुप में भुसा मिक्स किए हुए गेहूँ के दाने डाल दो, तो क्या करेगा? सारा सार को गही रहे, और थोथा देय उड़ाय।  थोथा थोथा, भूसा भूसा, जिसमें कोई दम नहीं है, मनुष्य तो खाते ही नहीं, जानते हैं। जानवरों को ख़िलादेते हैं। और जानवरों में ताकत आएगी भूसा खाने से?? कोई ताकत नहीं आती है। तो बताया बुद्धू बनाते हैं जानवरों को, विचारों को। क्या?? देखो हम तो नाक भर के भजन खिला रहे है। बढ़िया-2 खुद खा जाते हैं।* (@57.05-58.54) dt 06.03.2019_

Comments