अष्ट देव की परिपक्व स्टेज..... जिसमे चाहे उसमे प्रवेश करे।।

 जिज्ञासु: बाबा जो अष्ट देव है वह अष्ट दिगपाल अष्ट देव है। वह बाप को अंतिम जन्म में छोड़कर पूर्व जन्म में वह सहयोगी बनते है सूर्यवंशी । वह अष्ट रतन से भी श्रेष्ठ है ना।


बाबा: उनसे ज्यादा श्रेष्ठ है। क्यों? रतन जो होते हैं वह एक दूसरे से कम कीमत वाले होते हैं और जो सूर्यवंशी अष्ट देव है वह सिर्फ सूर्यवंशी है। सब हीरे हीरे हैं। कोई भी माणिक नहीं है, मोती नहीं है, पन्ना नहीं है, मूंगा नहीं है।


जिज्ञासु: तो अष्ट रतन से भी श्रेष्ठ है वो ? बाबा: हां। वो सदैव सूर्यवंशी के पार्ट बजाने वाले और वो.. वो बीच में द्वापर युग से ही दूसरे धर्म में कन्वर्ट हो जाएंगे


जिज्ञासु: लेकिन अष्ट रतन की ही क्यों गायन है अष्ट देव की क्यों नहीं है?


बाबा:,अष्ट रतन बनेंगे ही तब जब उनमें वह देव प्रवेश करेंगे। जिज्ञासु: वह अष्ट देव?


बाबा: हां जी। वह अष्ट देव जब तक प्रवेश करके उनके द्वारा श्रेष्ठ पार्ट नहीं बजाएंगे तब तक वह अष्ट रत्नों की गिनती में ही नहीं आएंगे। जिज्ञासु: माना उनका भी वह गायन है? बाबा: अष्ट देव है आत्मा तो अष्ट रतन है जैसे उनका शरीर । और?

जिज्ञासु: तो वास्तविक अष्ट रतन का गायन वह सूर्यवंशी ही है।

बाबा: हां जी। और?

दूसरा जिज्ञासु: जो अष्ट देव है आत्मा ही है ना। बाबा: आत्मा है।

जिज्ञासुः वह तो आत्मा ही है शरीर तो नहीं रहता है ?

बाबा: शरीर नहीं रहता है? शरीर रहता है लेकिन उनमें यह सिफ्त हो जाती है परिपक्व स्टेज पाने पर जब चाहें अपने शरीर में प्रवेश करके पार्ट बजाएं और जब ना चाहे तो शरीर अलग और आत्मा अलग। और वह आत्मा जहां चाहे जिस में चाहे प्रवेश करके उसकी बुद्धि को घुमा के वापस आ जाए अपने शरीर में।


Vcd 532 (32:22-34:32)

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