न स्वर्ग के सुख लेना है ,ना नर्क के। उसे कहेंगे असली वैरागी/संन्यासी ।

 *न स्वर्ग के सुख लेना है ,ना नर्क के। इस दुनिया को भी छोड़ा, इस दुनिया के सुखों को भी और इस दुनिया के दुखों को भी छोड़ा, तो क्या हुए?? बैरागी, सन्यासी*


*वो साधु भी ऐसे ही कहते रहते हैं-- ज्ञान भक्ति और वैराग्य। तो झूठ बोलते हैं या सही?? सही बोलते हैं।* पहले ज्ञान की प्रारब्ध स्वर्ग में सुख भोगते हो, फिर भक्ति की प्रारब्ध दुर्गति, दुख भोंगते हो, नीचे गिरते हो।

          *फिर जब मैं आता हूं, तो देवताओं के सुख को भी छोड़ो, ज्ञानेंद्रियों का सुख भी नहीं भोगेंगे, और भक्ति में क्या करते हैं? व्यभिचारी सुख भोगते हैं, तो वह सब अनेकों को याद करना, अनेकों से सुख भोगना, अनेकों से इंद्रियों के संबंध भोगना, सब छोड़ो।*

       *क्या करो??* *वैराग्य, इन सब से विपरीत राग।*

 राग- प्यार, इन सब से प्रीति छोड़ दो। *न स्वर्ग के सुख लेना है, ना नरक के।* कहां जाना है?? शांति धाम में जाना है, तो बैरागी हुए कि नहीं?

 *इस दुनिया को भी छोड़ा, इस दुनिया के सुखों को भी, इस दुनिया के दुखों को,तो क्या हुए?? बैरागी, सन्यासी।*

        इसीलिए वह कहते हैं, पहले ज्ञान भक्ति, फिर सृष्टि के अंत में वैराग।

     *अपन को आत्मा समझो, देह को भूलो। सारी दुनिया को भूलो। कहां जाना है? आत्म लोक में जाना है। वहां ना देह होगी, न देह के संबंधी होंगे, ना देह के पदार्थ होंगे।*2-06-19

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